यरिंग की घटना में जिंदा बचे एकमात्र शख्स 19 साल के सहदेव नमासूद्र मौत के उस मंजर को याद कर कांप उठते है.
वो कहते है, "आम दिनों की तरह उस दिन भी मैं अविनाश के घर पर आया हुआ था. अविनाश का छोटा भाई अनंत मेरा अच्छा दोस्त था. हम सभी लोग अविनाश के घर के भीतर बनी दुकान के बाहर बैठकर मोबाइल पर गाना सुन रहे थे. तभी अचानक तीन लोग मुंह पर काला कपड़ा बांधे सेना की वर्दी में घर के अंदर आए और हमें साथ चलने को कहा. हमने सोचा सेना के लोग है तो हम उनके साथ बाहर रास्ते पर चले गए."
"बाहर जाने पर मैंने देखा कि वो छह लोग थे और उनके साथ अविनाश के चाचा और गांव का एक व्यक्ति था. उन्होंने हमसे हिंदी में बात करते हुए कहा कि थोड़ा आगे चलो तुम लोगों से बात करनी है. फिर वो हमें नाले पर बने लोहे के पुल के उस पार ले गए और सभी को कतार में बैठने के लिए कहा. वहां काफी अंधेरा था और वे आपस में असमिया भाषा में बात कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने हमें डराया और जबरन कतार में बैठा दिया.फिर हमलावरों ने पीछे से फायरिंग की. फायरिंग के कारण वहां काफी धुआं फैल गया. मैं डर के मारे बेहोश हो गया था और पास के नाले में जा गिरा. थोड़ी देर बाद जब मुझे होश आया तो मैंने देखा सभी लोग जमींन पर गिरे हुए थे. मैं वहां से भागा और इस घटना की जानकारी गांव वालों को दी."
अपने माथे पर गोली की हल्की खरोंच दिखाते हुए सहदेव कहते है, "जब भी मेरी आंखों के सामने वो मंजर आता है, मेरा दिल कांप उठता है.कई रातों से सो नहीं पाया हूं. घर से निलकने में डर लगता है."
बंगाली मूल के लोगों पर हुए हमले को चार दिन बीत चुके है. लेकिन आसपास के इलाकों में अभियान चला रही पुलिस अभी तक एक भी हमलावर को गिरफ्तार नहीं कर पाई है.
बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव में मौजूद सदिया के पुलिस अधीक्षक प्रशांत सागर चांगमाई कहते है, "घटना के बाद से पुलिस अलग-अलग इलाकों में हमलावरों की तलाश में अभियान चला रही है. इस घटना के बाद धोला-सदिया पुल पर जांच के दौरान पुलिस ने वार्ता विरोधी उल्फा (आई) के एक लिंक मैन को गिरफ्तार किया है. डिकलाइन गोगोई नामक इस युवक को पुलिस ने पहले भी एक आईईडी बम के साथ गिरफ्तार किया था. फिलहाल उससे पूछताछ की जा रही है. वो पैसो के लिए उल्फा के साथ काम करता है."
नागरिकता संशोधन बिल पर राज्य में एक-दूसरे समुदाय के खिलाफ चल रही बयानबाजी के बाद क्या सरकार ने अलर्ट किया था, इस सवाल पर एसपी कहते है,"सरकार की तरफ से अलर्ट मैसेज आते रहते है और हमने उसके मुताबिक इन इलाकों में पुलिस पेट्रोलिंग की व्यवस्था की थी."
एसपी दावा कर रहे थे कि घटना वाले दिन स्थानीय थानेदार और पुलिस के जवान गांव में गश्त लगाने दो-तीन बार गए थे. लेकिन गांव वालों का आरोप है कि घटना के बाद जब थाने में फोन किया तो काफी देर तक फोन बंद आ रहा था. महज दो सौ मीटर की दूरी पर मौजूद थाने से पुलिस को मौके पर आने के लिए आधे घंटे से ज्यादा समय लग गया.
धोला थाना क्षेत्र के अंतर्गत बसे इस गांव के एक छोर में जहां पांच सौ मीटर की दूरी पर सैखुवा घाट पुलिस आउट पोस्ट है तो दूसरे छोर पर थाना है.लेकिन आश्चर्य की बात है कि हमलावरों की फायरिंग की आवाज को गांव वालों ने दिवाली के पटाखा समझा और पुलिस को वही आवाज सुनाई नहीं दी.हीं, एसपी चांगमाई कहते है,"इनसब बातों की और गांव वालों के आरोंपो की जांच हो रही है. बाद में हमारे शीर्ष अधिकारी इन सवालों का जवाब देंगे."
तिनसुकिया जिले के सदिया इलाके के आसपास वैसे तो बंगाली मूल के काफी लोग बसे हुए है लेकिन बीशोनिमुख खेरबाड़ी ही एक ऐसा गांव है जहां करीब सौ फिसदी हिंदू बंगाली लोग सालों से रह रहें है.
पुलिस इस हमले के पीछे चरमपंथी संगठन उल्फा (आई) को संदेह पर रख अपनी आगे की कार्रवाई कर रही है. जबकि प्रदेश में चारों तरफ हो रही निंदा के बाद उल्फा के परेश बरुआ गुट ने एक बयान जारी कर इस हमले में संगठन की संलिप्तता से इनकार किया है.
ऐसे में इस हमले को लेकर असम की सत्ता संभाल रही मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की सरकार सवालों के घेरे में है. क्योंकि प्रदेश में पिछले तकरीबन एक महीने से बंगाली हिंदूओं के नागरिकता वाले मुद्दे पर असमिया-बंगाली संगठन के कुछ नेताओं के बीच तकरारभरी बयानबाजी हो रही थी.
एक तरफ जहां असम के जातीय संगठन नागरिकता संशोधन बिल का लगातार विरोध कर रहे हैं वहीं बंगाली लोगों के अधिकतर संगठन इस बिल के समर्थन में है.
वो कहते है, "आम दिनों की तरह उस दिन भी मैं अविनाश के घर पर आया हुआ था. अविनाश का छोटा भाई अनंत मेरा अच्छा दोस्त था. हम सभी लोग अविनाश के घर के भीतर बनी दुकान के बाहर बैठकर मोबाइल पर गाना सुन रहे थे. तभी अचानक तीन लोग मुंह पर काला कपड़ा बांधे सेना की वर्दी में घर के अंदर आए और हमें साथ चलने को कहा. हमने सोचा सेना के लोग है तो हम उनके साथ बाहर रास्ते पर चले गए."
"बाहर जाने पर मैंने देखा कि वो छह लोग थे और उनके साथ अविनाश के चाचा और गांव का एक व्यक्ति था. उन्होंने हमसे हिंदी में बात करते हुए कहा कि थोड़ा आगे चलो तुम लोगों से बात करनी है. फिर वो हमें नाले पर बने लोहे के पुल के उस पार ले गए और सभी को कतार में बैठने के लिए कहा. वहां काफी अंधेरा था और वे आपस में असमिया भाषा में बात कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने हमें डराया और जबरन कतार में बैठा दिया.फिर हमलावरों ने पीछे से फायरिंग की. फायरिंग के कारण वहां काफी धुआं फैल गया. मैं डर के मारे बेहोश हो गया था और पास के नाले में जा गिरा. थोड़ी देर बाद जब मुझे होश आया तो मैंने देखा सभी लोग जमींन पर गिरे हुए थे. मैं वहां से भागा और इस घटना की जानकारी गांव वालों को दी."
अपने माथे पर गोली की हल्की खरोंच दिखाते हुए सहदेव कहते है, "जब भी मेरी आंखों के सामने वो मंजर आता है, मेरा दिल कांप उठता है.कई रातों से सो नहीं पाया हूं. घर से निलकने में डर लगता है."
बंगाली मूल के लोगों पर हुए हमले को चार दिन बीत चुके है. लेकिन आसपास के इलाकों में अभियान चला रही पुलिस अभी तक एक भी हमलावर को गिरफ्तार नहीं कर पाई है.
बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव में मौजूद सदिया के पुलिस अधीक्षक प्रशांत सागर चांगमाई कहते है, "घटना के बाद से पुलिस अलग-अलग इलाकों में हमलावरों की तलाश में अभियान चला रही है. इस घटना के बाद धोला-सदिया पुल पर जांच के दौरान पुलिस ने वार्ता विरोधी उल्फा (आई) के एक लिंक मैन को गिरफ्तार किया है. डिकलाइन गोगोई नामक इस युवक को पुलिस ने पहले भी एक आईईडी बम के साथ गिरफ्तार किया था. फिलहाल उससे पूछताछ की जा रही है. वो पैसो के लिए उल्फा के साथ काम करता है."
नागरिकता संशोधन बिल पर राज्य में एक-दूसरे समुदाय के खिलाफ चल रही बयानबाजी के बाद क्या सरकार ने अलर्ट किया था, इस सवाल पर एसपी कहते है,"सरकार की तरफ से अलर्ट मैसेज आते रहते है और हमने उसके मुताबिक इन इलाकों में पुलिस पेट्रोलिंग की व्यवस्था की थी."
एसपी दावा कर रहे थे कि घटना वाले दिन स्थानीय थानेदार और पुलिस के जवान गांव में गश्त लगाने दो-तीन बार गए थे. लेकिन गांव वालों का आरोप है कि घटना के बाद जब थाने में फोन किया तो काफी देर तक फोन बंद आ रहा था. महज दो सौ मीटर की दूरी पर मौजूद थाने से पुलिस को मौके पर आने के लिए आधे घंटे से ज्यादा समय लग गया.
धोला थाना क्षेत्र के अंतर्गत बसे इस गांव के एक छोर में जहां पांच सौ मीटर की दूरी पर सैखुवा घाट पुलिस आउट पोस्ट है तो दूसरे छोर पर थाना है.लेकिन आश्चर्य की बात है कि हमलावरों की फायरिंग की आवाज को गांव वालों ने दिवाली के पटाखा समझा और पुलिस को वही आवाज सुनाई नहीं दी.हीं, एसपी चांगमाई कहते है,"इनसब बातों की और गांव वालों के आरोंपो की जांच हो रही है. बाद में हमारे शीर्ष अधिकारी इन सवालों का जवाब देंगे."
तिनसुकिया जिले के सदिया इलाके के आसपास वैसे तो बंगाली मूल के काफी लोग बसे हुए है लेकिन बीशोनिमुख खेरबाड़ी ही एक ऐसा गांव है जहां करीब सौ फिसदी हिंदू बंगाली लोग सालों से रह रहें है.
पुलिस इस हमले के पीछे चरमपंथी संगठन उल्फा (आई) को संदेह पर रख अपनी आगे की कार्रवाई कर रही है. जबकि प्रदेश में चारों तरफ हो रही निंदा के बाद उल्फा के परेश बरुआ गुट ने एक बयान जारी कर इस हमले में संगठन की संलिप्तता से इनकार किया है.
ऐसे में इस हमले को लेकर असम की सत्ता संभाल रही मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की सरकार सवालों के घेरे में है. क्योंकि प्रदेश में पिछले तकरीबन एक महीने से बंगाली हिंदूओं के नागरिकता वाले मुद्दे पर असमिया-बंगाली संगठन के कुछ नेताओं के बीच तकरारभरी बयानबाजी हो रही थी.
एक तरफ जहां असम के जातीय संगठन नागरिकता संशोधन बिल का लगातार विरोध कर रहे हैं वहीं बंगाली लोगों के अधिकतर संगठन इस बिल के समर्थन में है.
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